बुढ़ापे में डेटिंग

40 में फ़्लर्ट करना तो ठीक है, पर जब आप 50 की हों, और अभी सिंगल रहने में मज़ा आ रहा हो तो? विद्या हेबले पूछती हैं

20 या 30 या 40 के दशक में भी सिंगल रहना तो एक मज़ेदार बात है. बहार ही नहीं, हर मौसम में दिल हरा-भरा रहता है, और आपको लगता है कि कभी भी ऐसा कोई मिल जाएगा जिसके साथ आप ज़िंदगीभर का नाता जोड़ लेंगे.

पर हममें से कुछ ऐसे भी हैं जो अकेले ही 50 की पहाड़ी पार कर चुके होते हैं, और शायद ढलान भी आधी उतर आए होते हैं. मैं जानती हूँ ऐसे बहुत से लोग हैं जो किसी नए रिश्ते के फंदे में पड़ना नहीं चाहते – कुछ तो आरंभ से संबंध बनाने से दूर रहते है – पर यहाँ हम प्यासे पंछियों की बात करेंगे. सीनियर सिंगल्स की.

हमें सोफ़े पर से उठने में मदद लगती है. बाथरूम जाना चिंता का विषय हो जाता है, उसपर वह वेस्टर्न होगा या निगोड़ा देसी स्टाइल का. (दूसरी तरह का हो तो ऐसी ऐसी कसरतें और आसन करने पड़ते हैं जिनका वर्णन हम इस सभ्य पत्रिका में नहीं कर सकते). डेट पर जाना हो तो सोचना पड़ता है कि क्या खाएँ जिससे पाचन-तंत्र में उथल-पुथल न मचे. लंच डेट हो तो प्रश्न उत्पन्न होता है, बाद में सोने को कितना टाइम मिलेगा? डिनर डेट हो तो – उफ़! कैसे कैसे सवाल! मीठा खाने के बाद क्या? कुछ संकेत दूँ, या प्रतीक्षा करूँ कि वह मुझे घर छोड़ने आएगा? और उसने पूछ लिया, “तुम्हारे घर या मेरे” तो क्या जवाब दूँ? मेरा घर तो कबाड़ख़ाना बना हुआ है, और वैसे भी मैं तो सोना ही पसंद करूँगी.

नए लोगों से ऑनलाइन मिलना ठीक है, पर सावधान, कहीं कोई धोखा न दे दे

और ये सब तो डेट-के-लिए-तैयार-हो-जाओ का उफ़नता दरिया पार करने के बाद की बातें हैं. कपड़े, त्वचा, बाल – महिलाएँ, और शायद कुछ पुरुष भी इससे परिचित होंगे. बाल सफ़ेद हो रहे हैं, उन्हें ठीक समय पर रंगना है ताकि न तो जड़ें दिखें, न ऐसा लगे कि अभी अभी डाय किए हैं. नाखून सँवारने हैं – रंग डार्क हो या लाइट? (एक विचार – नाखूनों की तरफ़ कोई देखता भी है?) स्मार्ट लगना ज़रूरी है पर ऐसा कुछ नहीं पहनना है जिससे परेशानी महसूस हो. यह सोचकर कसमसाते नहीं रहना कि काश मैं “बहनजी” स्टाइल की सलवार-कमीज़ पहनकर आई होती. काश! पायजामे फैशन में होते! देखा जाए तो पलाज़्ज़ो पैंट्स फैशनेबल पायजामे के सिवा और क्या है? चलो कपड़े तो तय हो गए. 

 

“क्या आप …. से मिली हैं?”

ये तो डेटिंग के चरण तक पहुँचने के बाद की बात है. उससे पहले तो किसी को खोजकर उनसे संपर्क बनाने का बड़ा लंबा चक्कर है. क़िस्मत वालों के परिवार या मित्र उन्हें किसी के साथ भिड़ा देते हैं. बाक़ी हम जैसे तो अख़बार के ‘पर्सनल’ विज्ञापन ऐसे देखते जैसे कोई बहुत ज़्यादा रुचि नहीं है… पर अब तो खैर इंटरनेट आ गया है. 

शुरू शुरू में तो ऑनलाइन डेटिंग या मैचमेकिंग साइट्स सिर्फ युवा लोगों पर केंद्रित हुआ करती थीं, पर जल्द ही ये स्पष्ट हो गया कि ई-जोड़ियाँ बनाने के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं. और न कोई ईमानदारी का ही! शादी की उम्मीद में ऑनलाइन ठगे जाने की कहानियाँ असंख्य हैं, जिनमें ज़्यादातर बड़ी उम्र की महिलाएँ शिकार होती हैं, परंतु पुरुष भी कई होते हैं. जब आप सामनेवाले तो देख नहीं पाते, तो यह जोखिम उठाना ही पड़ता है.

अपने ही शहर के “जोड़ीदार” तक सीमित रहना ही सुरक्षित है. पर खेद की बात है कि अपना समाज अब भी इतना दकियानूस है कि महिलाएँ किसी को अपने घर पर मिलने से डरती हैं कि “कहीं कोई देख न ले”. फिर भी समय बहुत बदल गया है और किसी महिला और पुरुष के एक साथ देखकर, भले ही वे “शादीशुदा नहीं लगते”, लोग अब तिरछी नज़र से नहीं देखते. अभिनेत्री सुहासिनी मुले के 60 वर्ष की उम्र में विवाह करने जैसे समाचारों से भी काफ़ी फर्क पड़ा है.

जोड़ीदार कैसे पकड़ें

जोड़ीदार को कैसे ढूंढकर पकड़ा जाए? मेरे ख़याल में तो सच्चाई और ईमानदारी ही सबसे अच्छे हैं. पर हाँ, कोई समझौता करने या अपने आप को ख़तरे में डालने से बचना ज़रूरी है. थोड़ा सा हास्य-विनोद भी काम में आता है जैसा कि मैंने जाना – बरसों पहले. मैंने जब कहा कि मेरा डाइवोर्स हो चुका तो उसने पूछा, “बच्चे?” “नहीं हैं”, मैंने कहा और साथ ही जोड़ दिया “लेकिन मेरे पास किताबें बहुत हैं”. वह हँसा, शायद उसे बात अच्छी लगी, और हमने तीन साल बड़े मज़े में बिताए, जब तक हम अलग अलग शहरों में रहने न लगे. कोई वादा या अपेक्षा न थी, सो हम दोस्तों की तरह जुदा हुए, आज भी मित्र हैं. 

शायद वही रिलेशनशिप आदर्श होती है जिसमें कसमे-वादे और अन्य ऐसे कोई तामझाम न हों. लेकिन मानवी मन दीर्घ सुनिश्चितता चाहता है, जो हम जैसे एक बार या उससे अधिक हाथ जला चुके लोगों के मन में डर पैदा कर देती है. तो हम टालमटोल करते हैं, कमिटमेंट चाहते भी हैं और उससे घबराते भी हैं, ‘यूँ होता तो’ के ख़्वाब देखते हैं, चैटरूम्स और सोशल मीडिया के चक्कर लगाते हैं. 

चैटिंग की एक कमी यह भी है कि हम जैसे पूर्ण वाक्य बोलने-लिखने वालों और शॉर्टहैंड का प्रयोग करनेवालों में एक बड़ा अंतर हो जाता है. मैं एक व्यक्ति को जानती हूँ जो किसी महिला से चैट कर रहे थे. महिला ने लिखा “m in krl”, ये समझे वह कुर्ला में रहती है, और चूँकि ये घाटकोपर में थे, बड़े खुश हुए. जब इन्होंने मिलने की बात कही तो पता चला वह केरल राज्य में रहती है! इनका हाल कच्चा करेला चबा लेने जैसा हो गया. आप किसी भी उम्र में कुछ बढ़िया बना सकते हैं!

घर में अकेले

सचमुच यह भावना कड़वी होती है – अकेलेपन की, किसी साथी की ज़रूरत महसूस करने की. लेकिन रिलेशनशिप बनाने के लिए कोई कदम उठाना इतनी बड़ी बात है कि अधिकतर लोग अकेला रहना ही पसंद करते हैं. एक अखबार ने वैलंटाइन्स डे से ठीक पहले कुछ ऐसे ही अपनी मर्ज़ी से एकाकी रहनेवालों पर एक लेख छापा. दुख की बात तो ये है कि सभी युवा थे. एक लड़की ने लिखा कि वह 23 बरस की है और ऊब चुकी है. समझ में नहीं आता हँसूं, या निराश होऊँ. 23 में मेरी ज़िंदगी तो बस शुरू होने जा रही थी!

अखबारों-पत्रिकाओं में ही नहीं, मैं ऑनलाइन भी 20-30 की उम्र के लोग देखती हूँ जो रिलेशनशिप की दौड़ से थक चुके हैं. अरे, असली मज़ा तो दौड़ लगाने में ही है, उनसे कहना चाहती हूँ. पर शायद वे यह कहकर हँसी उड़ाएँगे कि चली आई आंटी ज्ञान बाँटने. सोशल मीडिया की भूलभुलैया में किसी एक ने लिखा था कि वह बड़ी उम्र का है. मैंने मेसेज करके उसकी उम्र पूछी तो पता चला वह 33 का है. “दो महीनों में 34 का हो जाऊँगा”, उसने आगे बताया. मैं हँस दी, चैट में भी, और अपने आप से भी.

मुझे तो लगने लगा है कि हम सीनियर्स ही सही मानों में जवान हैं. चलिए, “सीनीयर्स के लिए डेटिंग साइट्स” गूगल करना शुरू करें. मैदान कभी नहीं छोड़ना! 

आप किसी भी उम्र में कुछ बढ़िया बना सकते हैं!

 

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