फाफड़ा फाइलें: अद्वितीय अमिताभ बच्चन, शशि थरूर और कोहिनूर

मीनू शाह लिखती हैं-अगली बार किसी ने मुझसे पूछा “क्या मैं हिन्दी हूं?”–  मैं उसे बलपूर्वक, मेरे बाद दोहराने के लिए कहूँगी हिन्दी एक भाषा है, हिन्दू एक तत्त्वज्ञान का अनुयायी है

मीनू शाह लिखती हैं-अगली बार किसी ने मुझसे पूछा “क्या मैं हिन्दी हूं?”–  मैं उसे बलपूर्वक, मेरे बाद दोहराने के लिए कहूँगी हिन्दी एक भाषा है, हिन्दू एक तत्त्वज्ञान का अनुयायी है

इस महीने के सीनियर्स टुडे पत्रिका के कवर स्टोरी ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया कि हम अभी भी ब्रिटिश राज से कितना कतराते हैं। शशि थरूर को रानी(इंग्लैंड)की  अंग्रेज़ी भाषा की पकड़ पर बहुत गौरव दिया गया है, लेकिन एक अप्रवासी भारतीय (एन.आर.आई) होने के नाते, जब वो हमारे नामों, धर्मों और त्योहारों के गलत उच्चारण अपने स्वर में  करते हैं, तो मेरे कानों  को  एक कठोर  दंड  मिलती है, क्योंकि इसके लिए मेरी देशी कान, अभी तक( मुझे 49 साल हो गए  अमेरिका में रहते हुए और अब भी अंग्रेज़ी फ़िल्में देखती हूँ, तो मुझे शीर्षक  चालू करने की आवश्यकता पड़ती है) आदी नहीं हुई है। वास्तव में यह एक विचार है जिस पर बातचीत की जानी चाहिए। एक अंग्रेजी औपनिवेशिकता के हैंगओवर को काटना ब्लडी मैरी ( स्कॉटलैंड के कटी हुई सिर वाली मैरी क्वीन के सपने भी इसमें मदद नहीं करती) के हैंगओवर को काटने की तुलना में कहीं अधिक आवश्यक है।

एक हालिया संबोधन में, श्री अमिताभ बच्चन ने  ऐसा ही एक बेहतरीन उदाहरण एक विश्व मंच पर प्रस्तुत किया। उन्होंने ध्यानपूर्वक समझाया कि जब,  रामायण को  “रामायणा”, धर्म को “धर्मा” और भारत को “भारता” कह कर उच्चारित किया है, तो वो इसे क्यूं अपमानजनक मानते है। वह    इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि ये स्वतंत्रता अंग्रेजों  द्वारा  छिन  ली गईं है, क्योंकि  उनकी जुबान हमारे संस्कृत बोलने वाले पूर्वजों के ध्वनि-प्रारूप पर महारत नहीं हासिल कर पाई। श्री बच्चन के इस संवाद का जोर इस बात पर था कि सभ्यता की मिलावट अस्वीकार्य  है।

जबकि ऑक्सफोर्डियन इंग्लिश में श्री शशि थरूर के अलंकरणीय कौशल, जो सारगर्भित कथा में मनभावन है, केवल नैतिक रूप से दिवालिया समाज के गुणों को बढ़ाते हैं। हम में से कुछ मुट्ठी भर लोग, जिन्हें प्रेप विद्यालय की शिक्षा का सुविधा प्राप्त हुई है, वो श्री शशि थरूर को, जबकि संपूर्ण राष्ट्र की  बहुसंख्यक जनता, श्री अमिताभ बच्चन की हास्य बातों और संदेश को, जो हिन्दी और अंग्रेज़ी  दोनों भाषाओं में होती हैं, उसे समझ सकते है।

एक सरल लेखन शैली का अनुसरण करते हुए, मैंने श्री बच्चन से प्रेरणा लेने का चयन किया, जो उन पाठकों को आकर्षित करेगी, जिसे हर शब्द का अर्थ जानने के लिए, शब्दकोश में ढूंढने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, जिसका अर्थ यह है कि किसी के अंग्रेजी भाषा के बेड़ियों को तोड़ना।  तथ्य यह है कि मेरे स्वार्थी अतीत में मेरे ढँके हुए गँवारपन के साथ, मेरी लेखनी भी शामिल थी, जो मेरे विशेष परवरिश को व्यक्त करने के लिए थी। श्री अमिताभ बच्चन, जिन्हें एक से अधिक भाषाओं में अपनी मध्यम आवाज के साथ, संभाषण-कला में महारत हासिल है, को सुनने के बाद मेरे आत्मसम्मान को भुनाने के लिए यह मेरी आत्मा से कहीं अधिक लाभदायक थी।

इसलिए, विकास की निरंतर भावना में, मैं कहती  हूँ, बहुत हुआ! अगली बार कोई मुझसे पूछे- “क्या मैं हिंदी हूँ?”- मैं बलपूर्वक मेरे बाद उसे दोहराने के लिए कहूँगी- हिंदी एक भाषा है, हिंदू एक तत्त्वज्ञान का अनुयायी है।

या

‘ तुम लोगों के माथे पर यह लाल बिंदु क्या है?’

मैं समझाऊंगी

‘यह एक गोली से बनी गड्ढा है, जो तुम जैसा कुछ गँवार इसे  हमारी शोभा बढ़ाने के लिए उपयुक्त  समझता है’

या

‘तुम्हारे घर से बदबू क्यों आती है?’

मैं  बहुत धैर्य से बताऊंगी कि हमारे मसाले काली मिर्च से परे हैं और बड़े आलंकारिता-पूर्वक उनसे पूछूँगी- ‘तुम से बदबू  क्यूं आती है?’ आह, मुझे पता चला गया, तुम्हारा स्नान करना एक साप्ताहिक अनुष्ठान है’।

इतना ही नहीं,  हम में से कुछ शेक्सपियर विचारधारा वाले चमचे थे, हमें इतना डर था कि; यहाँ अमेरिका में, एक अंग्रेजी-भाषी (कभी-कभी मुझे आश्चर्य होता था) दर्शक निर्भीकता से बातचीत के बीच में से चले जाते थे, जिस बातचीत के  एक शब्द में तीन शब्दांशों से अधिक शब्द का प्रयोग किया जाता था। एक दावत पर, शेक्सपियर या अंग्रेजी साहित्य के अन्य महारथियों का हवाला देने पर पाया, कि जैसे ही उन्हें मौका मिलता है मुट्ठी भर बंधक खिड़कियों, बालकनियों और  वो कोई भी रास्ता जहां से बच कर निकल सकते है, की ओर  आगे बढ़ते हैं। कुछ दुर्भाग्यशाली, जिनका साथ कोई नहीं देता,  अकेले याचना वाली आँखों से बचाव के लिए देखते हैं। हाथ जोड़कर घुटनों के बल बैठे, वे मेजबान को ढूंढने की कोशिश करते हैं, क्योंकि मेज़बान ने बहुत पहले से ही ऐसी  परिस्थितियों का सामना करना सीख लिया है। इसके साथ ही, अब हमारे पास संतानों के स्कोर हैं जो इस बात से बेखबर हैं कि साहित्य क्या परिभाषित करता है, क्योंकि रैप और इसकी कोई भी कविताएँ होमर और इलियड की गाथा बन जाती है। क्या हम में से कुछ, जो मर रहे थे, तब रानी( क्वीन ऑफ  इंग्लैंड) के अंग्रेजी भाषा की पवित्र गुणों को जागृत या मध्यस्थता करनी चाहिए थीं? मैं कहती हूं, क्यों नहीं? श्री अमिताभ बच्चन ने इसे करना सही पाया और स्वयं को आगे बढ़ाया।  नहीं, लेकिन वास्तव में कुंठित बुद्धि वाले दिमागों के अवरोधों पर तंज कसते हुए उन्होंने जीत हासिल की।

श्री शशि थरूर, आप पर वापस आने का मेरा यह  मतलब नहीं है कि मैं अपने हास्यास्पद शब्दों पर इठलाते हुए आपको अकेला कर दूं और मेरे व्यंग के लिए, आपको बली का बकरा बनाऊं। क्योंकि वास्तव में, मैं आपकी एक प्रशंसक हूं, सम्भवतः आपके राजनीतिक दृष्टीकोण के लिए नहीं। परंतु निश्चित रूप से, जब आपको चल रही संसद में, कुछ लोगों को डांटने सुना, तो आपकी वज़ह से मेरे होंठों पर थोड़ा झुकाव आ गया।

मैं मेरे पाठकों पर वापस आती हूं, आप क्या कहते हैं? यह कि हमें, श्री अमिताभ बच्चन और जाने-माने सांसद या श्री शशि थरूर को एक मंच पर इस बात के प्रमुख बिंदुओं पर बहस करने के लिए कहे कि, किस तरह संप्रेषण नियति के साधन के रूप में भाषा का प्रयोग किया जाना चाहिए, जो एतिहासिक महत्व को विकृत किए बिना हो। कौन जानता है, यह कहाँ ले कर जाएगा…?

कल्पना कीजिए, एक ऐसा समारोह आयोजित किया जा सके, जहां श्री अमिताभ  बच्चन और श्री शशि  थरूर, एक ही मंच पर  बहस कर रहे हों। हमारी विरासत से अंग्रेजी,  शाही  ताज़ को हटाने का हर  प्रयास विफल  हो चुका है, परंतु,  एक प्रखंड  वक्तव्य  शैली  के साथ, क्या हम अंग्रेज़-शाही के ग्लानि से उभर सकते है और कोहिनूर  वापस पा सकते है?  आखिरकार,  हमने कश्मीर वापस  ले लिया और लंदन  के  वेस्ट एंड रियल्टी की  बहुत सारी अचल संपत्ति। जो आधिकारिक  रूप  से हमारा है, उसे इस प्रकार से घोषित  करेंगे,  चर्चिल- हत्यारा है, और ऐसा ही कहा जाएगा और ऐसा ही किया  जाएगा। तथास्तु

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